निर्देशक: Arnab Upadhyay
एक लड़का अंधेरे कमरे में अपनी कहानी शुरू करने के लिए जूझ रहा है। उसे समझ नहीं आ रहा कि कहानी की शुरुआत कहाँ से करे। जब उसे एहसास होता है कि ज़िंदगी की शुरुआत भी अंधेरे से होती है और अंत भी अंधेरे में ही होता है, तो उसे प्रेरणा मिलती है और वह तय करता है कि अपनी कहानी की शुरुआत नायक से नहीं, बल्कि खलनायक से करेगा। जब आखिरकार रोशनी वापस आती है, तो वह सिर्फ उसके घर को ही रोशन नहीं करती, बल्कि उसकी ज़िंदगी में भी एक नई स्पष्टता लेकर आती है। तभी उसकी माँ का मैसेज आता है कि क्या बिजली वापस आ गई है। वह मुस्कुराते हुए जवाब देता है, “हाँ… रोशनी वापस आ गई है।” यह इस बात का प्रतीक है कि सच्ची कहानियाँ वहीं से शुरू होती हैं, जहाँ अंधेरा खत्म होता है।